बिलासपुर। शासन-प्रशासन द्वारा सुशासन और पारदर्शी राजस्व व्यवस्था के दावे किए जाते हैं, लेकिन ग्राम जोंकी, तहसील सकरी की एक जमीन का मामला इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यहां वर्ष 2007 में पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से जमीन खरीदने वाले व्यक्ति के पक्ष में नामांतरण आदेश पारित होने और ऋण पुस्तिका जारी होने के बावजूद ऑनलाइन राजस्व अभिलेख में पुराने भूमि स्वामी का नाम प्रदर्शित होता रहा। अब इसी कथित अभिलेखीय त्रुटि का खामियाजा जमीन खरीदने वाले व्यक्ति को भुगतना पड़ रहा है।


मामला ग्राम जोंकी स्थित खसरा नंबर 265/2, रकबा 0.4980 हेक्टेयर का है। शिकायतकर्ता हिमांशु दीक्षित के अनुसार उन्होंने उक्त भूमि को सहसराम से 15 जून 2007 को पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से खरीदा था। विक्रय के बाद उनके पक्ष में नामांतरण प्रकरण क्रमांक 30 में 25 जुलाई 2007 को नामांतरण आदेश भी पारित किया गया तथा उनके नाम ऋण पुस्तिका क्रमांक 0458194 जारी की गई।


सवाल यह है कि जब वर्ष 2007 में विक्रय के बाद नामांतरण की पूरी प्रक्रिया पूरी हो गई थी और खरीदार के नाम ऋण पुस्तिका भी जारी हो चुकी थी, तो राजस्व अभिलेखों को उसी समय पूर्ण रूप से दुरुस्त क्यों नहीं किया गया? ऑनलाइन भुइयां अभिलेख में वर्षों तक पुराने भूमि स्वामी का नाम क्यों प्रदर्शित होता रहा? और यदि यह तकनीकी अथवा अभिलेखीय त्रुटि थी तो इसे समय रहते ठीक करने की जिम्मेदारी किसकी थी?


शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसी अभिलेखीय विसंगति का लाभ उठाकर पुराने भूमि स्वामी सहसराम ने वर्ष 2026 में उसी जमीन की दोबारा रजिस्ट्री भूपेंद्र यादव के पक्ष में कर दी। इसके तुरंत बाद भूपेंद्र यादव द्वारा उक्त भूमि को SPRN Minerals Private Limited के पक्ष में विक्रय किए जाने की बात सामने आई है।


यानी जिस भूमि के संबंध में शिकायतकर्ता वर्ष 2007 से अपने पंजीकृत दस्तावेज, नामांतरण आदेश और ऋण पुस्तिका के आधार पर अधिकार का दावा कर रहा है, उसी भूमि का करीब 19 वर्ष बाद फिर से लेन-देन हो गया। मामला केवल जमीन के स्वामित्व विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि राजस्व अभिलेख में हुई कथित गलती ने बाद के लेन-देन का रास्ता कैसे बनाया?


शिकायतकर्ता ने वर्ष 2026 में हुए नामांतरण आदेशों को चुनौती देते हुए अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), तखतपुर के समक्ष छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 44(1) के अंतर्गत अपील प्रस्तुत की है। इसके साथ ही विवादित भूमि के संबंध में धारा 52 के अंतर्गत स्थगन आवेदन भी प्रस्तुत किया गया है।


शिकायतकर्ता का कहना है कि स्थगन आवेदन पर लंबे समय से प्रभावी निर्णय नहीं हुआ है। अधिवक्ता के माध्यम से कई बार शीघ्र कार्यवाही के लिए निवेदन किए जाने के बावजूद मामला लंबित रहने से आशंका बनी हुई है कि विवादित भूमि के संबंध में आगे भी कोई तृतीय पक्ष अधिकार निर्मित हो सकता है।


इस मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। शिकायतकर्ता के अनुसार अनावेदक पक्ष ने सिविल न्यायालय में भी मामला प्रस्तुत किया है, लेकिन अभी तक विवादित भूमि के संबंध में कोई Stay Order, Status Quo अथवा Temporary Injunction प्राप्त नहीं हुआ है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि ऐसा कोई आदेश है तो उसकी प्रमाणित प्रति सामने आनी चाहिए, ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके।


वहीं, ऑनलाइन राजस्व अभिलेख में वर्ष 2007 की स्थिति के अनुरूप सुधार के लिए शिकायतकर्ता ने तहसीलदार, सकरी के समक्ष धारा 115 के अंतर्गत अभिलेख दुरुस्ती का आवेदन भी प्रस्तुत किया है।


पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब 2007 में नामांतरण आदेश पारित हो चुका था, तब राजस्व अभिलेख को दुरुस्त करने की प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं हुई? यदि उस समय अभिलेख सही कर दिया जाता तो क्या वर्ष 2026 में उसी भूमि की दोबारा रजिस्ट्री संभव होती? और यदि ऑनलाइन अभिलेख में पुराना नाम तकनीकी या अभिलेखीय त्रुटि के कारण बना रहा तो इतने वर्षों तक उस त्रुटि को सुधारने की व्यवस्था कहां थी?


पीड़ित पक्ष का कहना है कि एक ओर उसे अपने वर्ष 2007 के दस्तावेजों के आधार पर अधिकार की रक्षा के लिए अलग-अलग राजस्व एवं अन्य कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अभिलेखीय त्रुटि का लाभ उठाकर उसी भूमि के बाद के लेन-देन की स्थिति पैदा हो गई।


शिकायतकर्ता ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, वर्ष 2007 से वर्तमान तक के राजस्व अभिलेखों और नामांतरण कार्यवाही की जांच की जाए, ऑनलाइन भुइयां अभिलेख में पुराने नाम के प्रदर्शित होने के कारणों को स्पष्ट किया जाए तथा लंबित अपील और स्थगन आवेदन पर नियमानुसार शीघ्र कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।


अब सवाल सिर्फ एक जमीन का नहीं है—सवाल यह है कि यदि राजस्व अभिलेख में नामांतरण के बाद भी रिकॉर्ड वर्षों तक दुरुस्त नहीं होगा, तो आम नागरिक अपने अधिकारों की सुरक्षा कैसे करेगा? और ऐसी गलती का खामियाजा आखिर पीड़ित ही क्यों भुगते?


मामले में प्रशासनिक जांच और लंबित न्यायिक कार्यवाही के परिणाम के बाद ही पूरे विवाद की अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी।