फ्रेंड लिस्ट से भरोसा जीतते हैं साइबर ठग, वीडियो कॉल के बाद निवेश का लालच देकर खाते से उड़ाते हैं रकम; एक मामले में 18 मिनट में पैसा कंबोडिया पहुंचा

सोशल मीडिया पर अब किसी परिचित का चेहरा और आवाज देखकर उस पर भरोसा करना भी जोखिम भरा हो गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से साइबर ठग असली व्यक्ति जैसे दिखने वाले चेहरे, हाव-भाव और आवाज वाले वीडियो तैयार कर लोगों को अपने जाल में फंसा रहे हैं। रोमांटिक स्कैम के इन मामलों में पहले सोशल मीडिया फ्रेंड बनकर विश्वास जीता जाता है, फिर वीडियो कॉल और निवेश का लालच देकर रकम ठगी जाती है। ठगी की रकम को म्यूल अकाउंट से क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर विदेश भेजने का नेटवर्क भी सामने आया है।

4 साल पुरानी सोशल मीडिया दोस्ती का उठाया फायदा

गुजरात के अहमदाबाद में सामने आए एक मामले में महिला की फ्रेंड लिस्ट में ‘अंजना पारकर’ (बदला हुआ नाम) करीब 4 साल से जुड़ी हुई थी। शुरुआत में लाइक और गुड मॉर्निंग संदेशों के जरिए बातचीत बढ़ाई गई। इसके बाद रोमांटिक रील्स और वीडियो कॉल के माध्यम से भरोसा कायम किया गया। बाद में निवेश का लालच देकर महिला से पैसे ठग लिए गए।

जांच में पता चला कि सोशल मीडिया पर संदेश भेजने वाली असली अंजना नहीं थी। ठगों ने सोशल मीडिया पर उपलब्ध फोटो और वीडियो का इस्तेमाल कर एआई की मदद से उससे मिलता-जुलता चेहरा, हाव-भाव और आवाज तैयार की थी। इस तरह परिचित व्यक्ति की पहचान का आभास देकर महिला को धोखे में रखा गया।

म्यूल अकाउंट से क्रिप्टो तक, 18 मिनट में विदेश पहुंची रकम

इस तरह की साइबर ठगी में रकम को तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए कई चरणों का इस्तेमाल किया जाता है। पहले पीड़ित से पैसा किराए पर लिए गए बैंक खाते यानी म्यूल अकाउंट में जमा कराया जाता है। इसके बाद रकम को कुछ ही मिनटों में क्रिप्टोकरेंसी, विशेष रूप से यूएसडीटी, में बदल दिया जाता है।

फिर क्रिप्टोकरेंसी को डिजिटल वॉलेट में भेजा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में ठगी की रकम करीब 18 मिनट में क्रिप्टोकरेंसी के जरिए कंबोडिया पहुंच गई। वहां से रकम को दूसरे नेटवर्क में स्थानांतरित किया जाता है, जिससे उसके वास्तविक स्रोत और अंतिम लाभार्थी का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।

विदेश में बैठे ठगों तक पहुंचना चुनौती

रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह के नेटवर्क में कंबोडिया और चीन से जुड़े साइबर ठगों की भूमिका की जांच की जा रही है। भारतीय एजेंसियां विदेश में बैठे मुख्य आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और कानूनी प्रक्रियाओं के कारण जांच में चुनौतियां आती हैं। कई मामलों में पुलिस स्थानीय एजेंटों या म्यूल अकाउंट उपलब्ध कराने वालों तक ही पहुंच पाती है।

यह मामला बताता है कि सोशल मीडिया पर वर्षों पुरानी दोस्ती, परिचित चेहरा या वीडियो कॉल भी किसी की असली पहचान का पुख्ता प्रमाण नहीं है। अनजान निवेश प्रस्तावों पर भरोसा करने, वीडियो कॉल पर दिख रहे व्यक्ति की पहचान की पुष्टि किए बिना पैसे भेजने और किसी के कहने पर बैंक खाते का इस्तेमाल कराने से बचना जरूरी है।