10 से अधिक शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का परिजनों का दावा, अस्पताल प्रबंधन ने कहा- डिस्चार्ज के समय बिल कम कराने का दबाव बनाया जाता है
बिलासपुर के व्यापार विहार स्थित एलाइट अस्पताल में इलाज के नाम पर मरीजों से मनमानी राशि वसूलने के आरोप एक बार फिर सामने आए हैं। मरीजों के परिजनों का दावा है कि अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ अब तक 10 से अधिक बार मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय में शिकायतें की जा चुकी हैं, लेकिन हर बार ठोस कार्रवाई के बजाय समझाइश देकर मामला खत्म कर दिया जाता है। परिजनों ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और CMHO की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।
एलाइट अस्पताल में रेलवे, NTPC और SECL सहित कई सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के अधिकारी-कर्मचारी इलाज के लिए पहुंचते हैं। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन इन संस्थानों से जुड़े मरीजों के साथ-साथ आम मरीजों से भी इलाज के एवज में मनमाना शुल्क वसूलता है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बिल को लेकर आपत्ति जताने पर स्वास्थ्य विभाग में निष्पक्ष जांच के बजाय नियमों का हवाला देकर परिजनों पर दबाव बनाया जाता है और समझौता करा दिया जाता है।
डिस्चार्ज के समय बिल को लेकर विवाद : अस्पताल प्रबंधन
मनमानी बिलिंग के आरोपों को एलाइट अस्पताल के प्रबंधक राजीब रंजन भांजा ने खारिज किया। उन्होंने कहा कि मरीज के परिजन इलाज के दौरान किसी तरह की आपत्ति नहीं जताते। जब मरीज ठीक होकर डिस्चार्ज होने की स्थिति में आता है और अंतिम बिल दिया जाता है, तब बिल को लेकर आपत्ति शुरू हो जाती है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में भर्ती के समय मरीजों से भारी-भरकम एडवांस नहीं लिया जाता। डिस्चार्ज के समय कई बार नेताओं या प्रभावशाली लोगों से फोन करवाकर बिल कम कराने का दबाव बनाया जाता है। उनके अनुसार, ऐसी स्थिति अस्पताल के लिए नई बात नहीं है।
लिखित शिकायत मिलने पर जांच कराएंगे : CMHO
CMHO डॉ. शुभा गरेवाल ने कहा कि एलाइट अस्पताल के खिलाफ फिलहाल किसी मरीज या उसके परिजन की ओर से कोई लिखित शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। यदि लिखित शिकायत मिलती है तो नियमानुसार निष्पक्ष जांच कराई जाएगी।
‘CMHO अपनी जिम्मेदारी से बच रहीं’
कांग्रेस नेता महेश दुबे ने आरोप लगाया कि एलाइट अस्पताल में मरीजों से इलाज के नाम पर मनमानी वसूली की जा रही है और यह बात अब सार्वजनिक हो चुकी है। उन्होंने कहा कि पूरे मामले में CMHO अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे मामलों में लीपापोती के बजाय स्वास्थ्य विभाग को जांच कर दोषी पाए जाने पर अस्पताल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।