बिलासपुर। गांव का नाम उसकी पहचान होता है, लेकिन बिलासपुर जिले के कुछ गांवों के नाम ही अब ग्रामीणों के लिए परेशानी और उपहास का कारण बन गए हैं। राजस्व और पंचायत के सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ‘चोर’, ‘कुकुर’ और ‘कसई’ जैसे शब्दों वाले गांवों के नाम को लेकर ग्रामीणों में लंबे समय से असहजता है। इन नामों का असर युवाओं के रोजगार से लेकर बच्चों की पढ़ाई और शादी-विवाह के रिश्तों तक पर पड़ने की बात सामने आ रही है।

बहतराई स्टेडियम में तीजा तिहार के मंच से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बेलतरा विधानसभा क्षेत्र के ग्राम चोरहादेवरी का नाम बदलकर रामदेवरी करने की घोषणा की। इसके बाद जिले के ऐसे अन्य गांवों के ग्रामीणों में भी उम्मीद जगी है, जो वर्षों से अपने गांव के नाम को लेकर उपहास झेल रहे हैं। कई गांवों में अब नाम बदलने के लिए ग्राम सभा में प्रस्ताव लाने की तैयारी शुरू हो गई है।

नौकरी के लिए भेजा तो गांव का नाम देखकर कर दिया मना

मस्तूरी क्षेत्र के चोरभट्ठी खुर्द में गांव के नाम को लेकर असहजता का एक मामला सामने आया। ग्राम पंचायत के पंच युसुफ अली ने बताया कि उन्होंने गांव के एक युवक को सुरक्षा एजेंसी में गार्ड की नौकरी के लिए भेजा था। दस्तावेज में गांव का नाम ‘चोरभट्ठी’ देखकर संबंधित अधिकारी ने उसे नौकरी देने से मना कर दिया।

सरपंच विजय लक्ष्मी पांडेय का कहना है कि पंचायत में नाम बदलने का प्रस्ताव लाने पर विचार किया जा रहा है। वहीं छात्र विभोर पांडेय और ओम यादव का कहना है कि कॉलेज में अपना गांव बताते समय उन्हें कई बार उपहास का सामना करना पड़ता है।

रिश्ते की बात में भी नाम सुनकर कसते हैं तंज

चोरभट्ठी कला के ग्रामीणों के मुताबिक गांव के नाम का असर सामाजिक रिश्तों पर भी पड़ रहा है। रामसनेही यादव ने बताया कि जब वे बच्चों के रिश्ते के लिए दूसरे गांवों में जाते हैं तो कई बार सामने वाले गांव के नाम को लेकर तंज कसते हैं। लोग मजाक में पूछते हैं कि क्या इस गांव में चोर रहते हैं।

ग्रामीण रामफल श्रीवास के अनुसार पुराने समय में क्षेत्र में बड़ा मवेशी चारागाह हुआ करता था। इसी वजह से गांव का नाम ‘चरभट्ठी’ पड़ा था। बाद में चोरी की घटनाओं और नाम के गलत उच्चारण के कारण यह सरकारी रिकॉर्ड में ‘चोरभट्ठी’ दर्ज हो गया। सरपंच शिवदयाल यादव ने कहा कि ग्रामीणों की सहमति से ग्राम सभा में नाम बदलने का प्रस्ताव पारित कराया जाएगा।

‘कुकुर’ शब्द से भी छुटकारा पाने की तैयारी

मस्तूरी ब्लॉक के कुकुर्दकिरा, कुकुर्दीकला और कुकुर्दीखुर्द गांव भी अपने नाम को लेकर इसी तरह की परेशानी झेल रहे हैं। छत्तीसगढ़ी में कुत्ते के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘कुकुर’ शब्द से जुड़े होने के कारण ग्रामीणों का कहना है कि गांव का नाम अक्सर मजाक का विषय बन जाता है।

कुकुर्दकिरा के सरपंच शत्रुहन पटेल ने बताया कि जल्द ही ग्राम पंचायत की विशेष बैठक बुलाकर नाम बदलने के संबंध में प्रस्ताव तैयार करने की दिशा में कदम उठाया जाएगा।

बिल्हा ब्लॉक के चोरहाभैना में भी नाम बदलने की चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि ग्रामीणों के सामने एक व्यावहारिक चुनौती भी है। ग्रामीणों का कहना है कि उनके सभी दस्तावेजों में गांव का मौजूदा नाम दर्ज है। यदि नाम बदला जाता है तो आधार, जमीन, बैंक सहित अन्य दस्तावेजों में भी संशोधन कराना पड़ेगा।

ऐसे बदलता है गांव का नाम

गांव का नाम बदलने की प्रक्रिया ग्राम सभा से शुरू होती है। इसके लिए ग्राम पंचायत की विशेष ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित किया जाता है। इसके बाद प्रस्ताव जनपद पंचायत और एसडीएम के माध्यम से कलेक्टर तक पहुंचता है। वहां से प्रस्ताव राजस्व विभाग को भेजा जाता है।

राज्य स्तर पर मंजूरी के बाद प्रस्ताव केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजा जाता है। प्रक्रिया के तहत सर्वे ऑफ इंडिया, रेलवे और डाक विभाग जैसी संबंधित एजेंसियों से आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र लिए जाते हैं। केंद्र की मंजूरी के बाद राज्य सरकार राजपत्र में नाम परिवर्तन की अधिसूचना जारी करती है।

पंचायत से प्रस्ताव आएगा तो शासन को भेजेंगे

जिला पंचायत के सीईओ संदीप अग्रवाल ने कहा कि यदि ग्राम पंचायतों की ओर से गांवों के नाम बदलने संबंधी प्रस्ताव प्रशासन के पास आता है तो उसे राज्य शासन को भेजा जाएगा। उन्होंने बताया कि चोरहादेवरी का नाम बदलने का प्रस्ताव बेलतरा विधायक की ओर से दिया गया था।

अब मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद जिले के दूसरे गांवों में भी नाम परिवर्तन की मांग जोर पकड़ने लगी है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि लंबे समय से उपहास और असहजता का कारण बने इन नामों को बदलकर उन्हें ऐसी पहचान मिलेगी, जिसे वे सम्मान के साथ बता सकें।