शंख, ढाक और कांसा की ध्वनि के बीच बंगाली परंपरा से मां दुर्गा की आराधना, मीना बाजार और खानपान के स्टॉल बने आकर्षण
बिलासपुर। बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और दुर्गोत्सव की पारंपरिक छटा देखनी हो तो इन दिनों रेलवे परिक्षेत्र स्थित बंगाली स्कूल का प्रांगण आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां बिलासपुर बंगाली एसोसिएशन द्वारा शहर की सबसे पुरानी दुर्गा पूजा परंपरा का 103वां वर्ष मनाया जा रहा है। मां दुर्गा की पारंपरिक बंगाली प्रतिमा, शंख की गूंज, ढाक और कांसा की ध्वनि के बीच हो रही पूजा-अर्चना श्रद्धालुओं को बंगाल के दुर्गोत्सव का अहसास करा रही है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ यहां विशाल मेले का आयोजन भी किया गया है, जहां खरीदारी, खानपान और मनोरंजन के लिए बड़ी संख्या में शहरवासी पहुंच रहे हैं।
बंगाली स्कूल परिसर में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा बंगाल की पारंपरिक मूर्तिकला और पूजा पद्धति की झलक प्रस्तुत कर रही है। यहां पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बंगाली समाज की सांस्कृतिक पहचान और एक सदी से अधिक समय से चली आ रही परंपरा का उत्सव भी है। षष्ठी से शुरू हुए दुर्गोत्सव में देवी के बोधन, आमंत्रण और अधिवास की रस्मों के बाद सप्तमी और महाष्टमी के अनुष्ठान पूरे विधि-विधान से किए जा रहे हैं। मंत्रोच्चार, शंखनाद और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि से पूरा परिसर भक्तिमय बना हुआ है। श्रद्धालु मां के दर्शन कर पुष्पांजलि अर्पित कर रहे हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं।
1923 में शुरू हुई थी दुर्गा पूजा की परंपरा
बिलासपुर में बंगाली परंपरा के अनुसार दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1923 में हुई थी। शुरुआती दौर में बंगाल से आए रेलकर्मियों ने चुचुहियापारा क्षेत्र में एकजुट होकर मां दुर्गा की पूजा शुरू की थी। उस समय दुर्गा प्रतिमा पश्चिम बंगाल से रेलमार्ग के जरिए बिलासपुर लाई जाती थी। शुरुआती वर्षों में सीमित संसाधनों के बीच शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे शहर की प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन गया। बाद में दुर्गा पूजा का आयोजन बंगाली स्कूल परिसर में होने लगा, जहां आज भी यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है।
एक सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पूजा की मूल परंपराओं को सहेजकर रखा गया है। बंगाली रीति-रिवाजों के अनुरूप देवी की प्रतिमा स्थापना, पारंपरिक पूजा पद्धति और धार्मिक अनुष्ठान इस आयोजन की विशेषता हैं। अब यह उत्सव केवल बंगाली समाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहर के विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के लोग भी इसमें शामिल होते हैं। हर साल की तरह इस बार भी दुर्गोत्सव को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह दिखाई दे रहा है।
पूजा के साथ सजा विशाल मेला, मीना बाजार में रौनक
बंगाली स्कूल प्रांगण में मां दुर्गा के दर्शन के साथ मेले का आनंद लेने के लिए भी लोगों की भीड़ उमड़ रही है। परिसर और आसपास के क्षेत्र में तरह-तरह की दुकानें सजाई गई हैं। मीना बाजार में बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए मनोरंजन और खरीदारी के अनेक विकल्प मौजूद हैं। घरेलू उपयोग की वस्तुओं, सजावटी सामान और अन्य उत्पादों की दुकानों पर लोग खरीदारी करते नजर आ रहे हैं।
मेले में लगे खानपान के स्टॉल भी लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। विभिन्न प्रकार के व्यंजनों और नाश्ते की दुकानों पर दिनभर चहल-पहल बनी हुई है। परिवार के साथ पहुंचे लोग पहले मां दुर्गा के दर्शन कर रहे हैं और फिर मेले में घूमने, खरीदारी करने तथा पसंदीदा व्यंजनों का आनंद लेने में समय बिता रहे हैं। शाम होते ही परिसर में भीड़ और रौनक बढ़ रही है। धार्मिक आस्था के साथ मनोरंजन और खरीदारी का यह संगम दुर्गोत्सव को शहरवासियों के लिए विशेष बना रहा है।
धार्मिक आस्था के साथ बंगाली संस्कृति का उत्सव
बिलासपुर का दुर्गोत्सव अपनी विशिष्ट परंपरा और भव्यता के कारण अलग पहचान रखता है। बंगाली स्कूल परिसर में आयोजित पूजा में जहां पारंपरिक विधि-विधान का पालन किया जा रहा है, वहीं मेले में उमड़ रही भीड़ शहर की उत्सवप्रियता को भी दर्शाती है। शंख, ढाक और कांसा की ध्वनि के बीच मां दुर्गा की आराधना, पारंपरिक प्रतिमा और सजे हुए बाजार का दृश्य पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना रहा है।
103वें वर्ष में पहुंचा यह आयोजन बिलासपुर की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक सदी पहले रेलकर्मियों की पहल से शुरू हुई दुर्गा पूजा आज जनभागीदारी के बड़े उत्सव का रूप ले चुकी है। बंगाली स्कूल प्रांगण में उमड़ रही भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को जोड़ते हुए आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ आगे बढ़ रही है।