ठेका कंपनी का भुगतान रोकने के निर्देश, गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार इंजीनियरों पर कार्रवाई नहीं; जोन-7 के काम का टेंडर और भुगतान जोन-3 से होने पर भी सवाल
बिलासपुर। सरकंडा खेल परिसर में फ्लड लाइट लगाने के मामले में जांच के बाद करीब 30 लाख रुपये की गड़बड़ी सामने आई है। टेंडर की शर्तों के मुताबिक 1000 वाट की फ्लड लाइट लगाई जानी थी, लेकिन मौके पर 500 वाट की लाइटें लगा दी गईं। करीब 1.50 करोड़ रुपये के इस काम में गड़बड़ी की पुष्टि के बाद नगर निगम आयुक्त प्रकाश सर्वे ने ठेका कंपनी दीपक इलेक्ट्रिकल का 30 लाख रुपये का भुगतान रोकने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, इस मामले में जिम्मेदार माने जा रहे इंजीनियरों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। उन्हें नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया था, जबकि संबंधित इंजीनियर प्रवीण शुक्ला अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
जानकारी के मुताबिक, जिला खेल परिसर के चार पोल पर 50-50 फ्लड लाइट लगाने की योजना थी। इस तरह कुल 200 फ्लड लाइटें लगाई जानी थीं और प्रत्येक की क्षमता 1000 वाट निर्धारित थी। इसके बावजूद 500 वाट की लाइटें लगा दी गईं। इससे काम की गुणवत्ता, स्वीकृत तकनीकी मापदंडों और भुगतान की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच में करीब 30 लाख रुपये की गड़बड़ी सामने आने के बाद ठेका कंपनी का भुगतान रोकने का निर्देश तो दिया गया, लेकिन तकनीकी जांच और कार्य की निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही अब भी स्पष्ट नहीं है।
काम जोन-7 का, टेंडर और भुगतान जोन-3 से कैसे?
इस मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि सरकंडा खेल परिसर नगर निगम के जोन-7 के अंतर्गत आता है, लेकिन फ्लड लाइट लगाने के काम की टेंडर प्रक्रिया और भुगतान जोन-3 से कैसे हुआ? जिस क्षेत्र में काम किया गया, वहां के बजाय दूसरे जोन से फाइल आगे बढ़ाने के पीछे क्या प्रशासनिक आदेश था? तकनीकी स्वीकृति किसने दी, लाइटों की क्षमता की पुष्टि किस अधिकारी ने की और भुगतान से पहले काम का सत्यापन किसने किया? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है। निगम के अधिकारियों की ओर से इस संबंध में स्पष्ट जानकारी नहीं दिए जाने से संदेह और गहरा रहा है।
इंजीनियरों की भूमिका पर सवाल, कार्रवाई सिर्फ नोटिस तक सीमित
फ्लड लाइट की क्षमता में अंतर सामने आने के बाद तत्कालीन इंजीनियर प्रवीण शुक्ला और भीमेंद्र गौतम को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया था। लेकिन जांच में गड़बड़ी की पुष्टि होने के बावजूद अब तक उनके खिलाफ किसी ठोस कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है। प्रवीण शुक्ला सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि स्वीकृत क्षमता के विपरीत लाइटें लगाई गईं, तो तकनीकी परीक्षण, कार्य की गुणवत्ता और भुगतान की मंजूरी देने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई?
नए पोल लगाने के काम में भी पुराने पोल के इस्तेमाल की चर्चा
शहर में 5 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से नए पोल और लाइट लगाने का काम भी चल रहा है। इस बीच सूत्रों के हवाले से यह बात सामने आई है कि कुछ स्थानों पर पुराने पोल को डेंटिंग-पेंटिंग कर दोबारा लगाए जाने की बात कही जा रही है। यदि ऐसा हो रहा है, तो इसकी भी तकनीकी जांच कराई जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि काम निर्धारित शर्तों के अनुसार हो रहा है या नहीं।
नगर निगम आयुक्त प्रकाश सर्वे ने कहा कि सरकंडा खेल परिसर में फ्लड लाइट लगाने के मामले की जांच हो चुकी है और ठेका कंपनी का 30 लाख रुपये का भुगतान रोकने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, पूरे मामले में केवल ठेका कंपनी का भुगतान रोकना पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। जरूरी है कि तकनीकी स्वीकृति से लेकर कार्य के सत्यापन और भुगतान तक की प्रक्रिया की जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए, ताकि सरकारी राशि के उपयोग में हुई गड़बड़ी पर जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।