
राजधानी रिपोर्टर/सौरभ साहू की विशेष रिपोर्ट,,,
लोकेशन, सूरजपुर छत्तीसगढ़।।
सूरजपुर। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारों के सामने आज एक ऐसा सवाल खड़ा हो रहा है, जिसका जवाब शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को देना चाहिए।
जब किसी मंत्री, विधायक या जनप्रतिनिधि का कार्यक्रम होता है, तो खबर को जनता तक पहुंचाने के लिए स्थानीय पत्रकार सबसे पहले मैदान में दिखाई देते हैं। लेकिन जब उन्हीं पत्रकारों की मेहनत और बकाया विज्ञापन राशि के भुगतान की बात आती है, तो आखिर उन्हें बार-बार कार्यालयों और जनप्रतिनिधियों के प्रतिनिधियों के चक्कर क्यों लगाने पड़ते हैं?
सोशल मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता के दौर में बड़ी संख्या में छोटे एवं स्वतंत्र पत्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद लगातार जनहित की खबरें सामने ला रहे हैं। सड़क, बिजली, पानी, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और आम जनता की समस्याओं से लेकर शासन की योजनाओं तक—स्थानीय पत्रकार अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
लेकिन इस पत्रकारिता के पीछे लगने वाली लागत पर शायद ही कभी चर्चा होती है।।।
पेट्रोल का खर्च, मोबाइल और इंटरनेट का खर्च, कैमरा एवं अन्य उपकरणों का खर्च, घटनास्थल तक पहुंचने का खर्च और घंटों की मेहनत—इन सबके बावजूद स्थानीय पत्रकार अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।।
ऐसे में विज्ञापन के माध्यम से मिलने वाला भुगतान उनके लिए कोई एहसान नहीं, बल्कि उनके मीडिया कार्य और प्रकाशित सामग्री से जुड़ी व्यावसायिक आय है।
सवाल यह है—भुगतान में इतनी देरी क्यों?
पत्रकारों का कहना है कि कई बार विज्ञापन के लिए संपर्क करने के बाद उन्हें संबंधित प्रतिनिधियों या पीए के माध्यम से बार-बार इंतजार करने को कहा जाता है। दूसरी ओर, बड़े और स्थापित मीडिया संस्थानों को प्राथमिकता मिलने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।।
अगर स्थानीय पत्रकारों से खबरें चाहिएं, कवरेज चाहिए, सरकार की योजनाओं और जनप्रतिनिधियों के कार्यक्रमों की जानकारी जनता तक पहुंचानी है, तो फिर स्थानीय और छोटे मीडिया संस्थानों के साथ भुगतान और विज्ञापन के मामले में पारदर्शिता क्यों नहीं होनी चाहिए?
यह किसी एक पत्रकार की समस्या नहीं है।
यह उन तमाम छोटे पत्रकारों की आवाज है, जो सीमित साधनों में अपने परिवार का खर्च चलाते हुए पत्रकारिता को जिंदा रखे हुए हैं।।
🔥 अब पत्रकार पूछ रहे हैं —
*खबर चाहिए तो स्थानीय पत्रकार,
कवरेज चाहिए तो स्थानीय पत्रकार,
जनता तक संदेश पहुंचाना हो तो स्थानीय पत्रकार,
फिर मेहनत का भुगतान देने की बारी आए तो इंतजार क्यों?
पत्रकारों का कहना है कि बकाया विज्ञापन भुगतान की स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए और जिन संस्थानों अथवा मीडिया प्रतिनिधियों की वैध राशि लंबित है, उनके भुगतान की प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी की जानी चाहिए।। यदि समय रहते इस विषय पर सकारात्मक पहल नहीं होती है, तो पत्रकार साथी लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से विरोध, ज्ञापन, धरना अथवा अन्य वैधानिक माध्यमों से अपनी मांग शासन-प्रशासन तक पहुंचाते हुए विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं।
हालांकि किसी भी आंदोलन से पहले संबंधित विज्ञापनों, बिलों, स्वीकृतियों और बकाया राशि का दस्तावेजी विवरण सार्वजनिक एवं सत्यापित करना भी जरूरी होगा, ताकि मामला पूरी पारदर्शिता के साथ जनता के सामने रखा जा सके।। और हमारे पास मौजूद सभी सबूतों के साथ प्रस्तुत किया जाएगा ताकि इनकी सच्चाई आमजनता के सामने आ सके।।
और एक बात स्पष्ट है
पत्रकार किसी से भीख नहीं मांग रहा
वह अपनी मेहनत, अपने समय और अपने काम का उचित भुगतान मांग रहा है।
सरकार और जनप्रतिनिधियों को भी समझना होगा कि स्थानीय पत्रकार केवल चुनाव या कार्यक्रमों के समय उपयोगी नहीं होते। वे पूरे साल जनता और व्यवस्था के बीच संवाद का माध्यम बने रहते हैं।।। इसलिए समय आ गया है कि छोटे और स्वतंत्र मीडिया संस्थानों की समस्याओं को भी गंभीरता से सुना जाए और बकाया भुगतान के लिए स्पष्ट समयसीमा एवं पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए।
क्योंकि कलम की ताकत को सम्मान देने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि पत्रकार की मेहनत का सम्मान भी किया जाए।।।
नोट: जिन जनप्रतिनिधियों, विभागों या मीडिया संस्थानों पर बकाया भुगतान से संबंधित बात कही जा रही है, उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी खबर में प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।